
अपने मन को आज टटोलें,
जाने कितने, राज ये खोलें l
ये मन बड़ा ही है चंचल,
भटकता रहता है पल पल,
इस पर रखना है अंकुश,
बेकाबू हो जाये न कल ।
कुछ ऐसी तरकीब निकालें ,
जिससे इसको रखे संभाले ,
वरना कितने राज ये खोले,
जाने कितने, राज ये खोलें l
ये मन बड़ा ही है चंचल,
भटकता रहता है पल पल,
इस पर रखना है अंकुश,
बेकाबू हो जाये न कल ।
कुछ ऐसी तरकीब निकालें ,
जिससे इसको रखे संभाले ,
वरना कितने राज ये खोले,
अपने मन को आज टटोलें ।
ये मन कितना पापी है,
कितने ही इस पर हावी हैं,
कितनों पर था ये आया ,
बन सका न कोई साथी है ।
देनी पड़ेगी इसे परीक्षा,
ऐसी प्रभु की इच्छा बोले,
जाने कितने राज ये खोले,
अपने मन को आज टटोलें ।
अपने मन मंदिर में जाऊं,
प्रभु चरणों में शीश झुकाऊ,
हो जाये ये साफ़ सुथरा ,
रहे न इसमें कोई दूसरा,
ऐसा हो मेरे "मन" का काम,
जिसमे हों केवल "श्रीराम"।
ये मन कितना पापी है,
कितने ही इस पर हावी हैं,
कितनों पर था ये आया ,
बन सका न कोई साथी है ।
देनी पड़ेगी इसे परीक्षा,
ऐसी प्रभु की इच्छा बोले,
जाने कितने राज ये खोले,
अपने मन को आज टटोलें ।
अपने मन मंदिर में जाऊं,
प्रभु चरणों में शीश झुकाऊ,
हो जाये ये साफ़ सुथरा ,
रहे न इसमें कोई दूसरा,
ऐसा हो मेरे "मन" का काम,
जिसमे हों केवल "श्रीराम"।
" अल्पना मिश्रा "
Nice poem, Jai Shri Ram...
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