Tuesday, January 2, 2024

नूतन वर्ष

सुबह तो वही है, पर मन बहुत विभोर है,

आज से शुरू, नये साल का दौर है l


दिल से जिये कल,

अब आज में आ गये ।

मन में फिर‌ नये नये,

सपने सजा रहे ।

नाच रहा जिस में मेरी चाहतों का मोर‌ है।

सुबह तो वही है, पर मन...


जैसे कोई कठिन राह,

पार कर आया हो।

आगे चल कुदरत ने,

जलवा दिखाया हो।

छाई और गई, हर घटा घनघोर है।

सुबह तो वही है, पर मन...


बहुत जिए जिंदगी,

विधाता तेरा शुक्र है।

तेरी कृपा से भगवन, 

हर जीव बेफिक्र है।

जीने की चाह बहुत, देह बेशक कमजोर है।

सुबह तो वही है , पर मन ......


आदर बड़ों को ,

छोटों को प्यार है 

नूतन वर्ष की,आज से बहार है।

उम्मीदों का सुखद अहसास,अब फैला चहुँ ओर है।

सुबह तो वही  है , पर मन बहुत विभोर है।

आज से शुरू, नये साल का दौर है ...


"अल्पना बाजपेई मिश्रा" अल्पी

Wednesday, August 22, 2018

सुहावना सावन


कभी सखी सा, कभी पिया सा,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

घनघोर घटायें, रिमझिम फुहारें,
मिट्टी की सौंधी खुशबू ;
मन बरबस, रूमानी हो जाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

प्रकृति में सबकुछ, धुला-धुला सा,
पक्षी दर्शन, उनका कलरव ;
सुखद एहसास, आत्म-विभोर कर जाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

सावन है प्रतिबिम्ब, खुशियों का,
हाथों में मेंहदी, पींगे झूलों कीं ;
नवेली दुल्हन के, प्यार का, पैगाम है लाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

रक्षाबंधन का त्यौहार, तीज का श्रंगार,
‘अल्पी’ तेरे, स्त्रीत्व पर है नाज़ करवाता ;
कभी सखी सा, कभी पिया सा
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

                        “अल्पना मिश्रा”

Friday, August 17, 2018

मेरी ‘अभिव्यक्ति’ तुम


मेरी   शक्ति  में ,
मेरी   भक्ति   में ,
मेरी तपस्या में , हरदम
मेरी अभिव्यक्ति तुम l


       मेरी   साधना  में ,
       मेरी  आराधना  में ,
       मेरी भावनाओं में , हरदम
       मेरी अभिव्यक्ति तुम l

  मेरी   सांसो  में ,
  मेरे   अहसांसो   में ,
  मेरेअंतर्मन’ की गहराइयों में , हरदम
  मेरी अभिव्यक्ति तुम l


            मेरे  खयालो   में ,
            मेरे  सवालों   में ,
            मेरी तन्हाइयों में , हरदम
            मेरी अभिव्यक्ति तुम l

मेरी   आशा   में ,
जीवन की परिभाषा में ,
तुम्हारे बिन  अल्पी’ ,  बेकस ”
मेरी अभिव्यक्ति तुम l

  “अल्पना मिश्रा”



Saturday, October 21, 2017

श्यामली कोकिला

कोयलिया तुम हो , काली काली l
          जैसे ‘श्याम रंग’ में , रंगी श्यामली ll

भोर भये आँगन में , जब टेर लगाती l
           मेरे मन को , तुम बहुत लुभाती ll
फुदक -फुदक कर , डाली डाली पर l
          ‘साँवरे’ की तरह , तुम बहुत सताती ll

कूक -कूक कर , मुझे बताती l
          मैं हूँ तेरे , ‘कान्हा’ की मतवाली ll
कूक सुन ‘अल्पी’ , व्याकुल हो जाती l
          मानो बज उठी  , मेरे “प्रीतम” की बांसुरी ll

कोयलिया तुम हो , काली काली l
          जैसे ‘श्याम रंग’ में , रंगी श्यामली ll


                                “अल्पना मिश्रा”

Sunday, April 5, 2015

"होली"

आया होली का त्यौहार, लाया खुशियां अपार |

बागों में अमुआँ की, डाली-डाली है बौराई ,
खिल उठे फूल टेसू के, केसरिया चादर है ओढ़ाई,
मानो जैसे बसुंधरा, कर आयी है श्रृंगार ,
आया होली का त्यौहार, लाया खुशियां अपार |
टोली, होली की आते ही, जहन में, ये बात आई ,
भरकर मुठ्ठी अबीर-गुलाल की, चारों ओर है उड़ाई,
मानो धरा पर उमड़ आया हो, बदरा का गुबार,
आया होली का त्यौहार, लाया खुशियां अपार |


बच्चे भरकर गुब्बारे , एक-दूजे पर करें प्रहार,
रंग भरी पिचकारी से, एक-दूसरे पर मारें धार,
मानो आयी धरती पर, सतरंगी सावन की बौछार,
आया होली का त्यौहार, लाया खुशियां अपार |
घर-घर बने पकवानों से, खुशबू की आ रही बहार,
जाकर घर एक-दूसरे के, खूब खाए बारम्बार ,
ठंडाई के आगोश में , मानो मदहोश हुआ संसार,
आया होली का त्यौहार, लाया खुशियां अपार |

उमंग-उल्लास से भरा, खुशियों का है यह त्यौहार ,
सारी दुश्मनी मिटाकर, आयो खेलें मिलकर यार,
मानो 'अल्पी' बसुधा पर, 'एक कुटुंब' है यह संसार,
आया होली का त्यौहार, लाया खुशियां अपार |
..........." अल्पना मिश्रा "

Tuesday, February 4, 2014

मेरी मंजिल

तमन्ना थी दिल में,
फूल  पाने  की,
और अपने जीवन में,

उनकों सजाने की |

चले थे हम, काँटों भरी राह,
अपनी मंजिल को तलाशने 
। 
काँटों ही काँटों से, घिरे हुए हम ,
निकले थे फूल को, हासिल करने |

कांटे दर कांटे, चुभते गए ,
हम अपने दर्द को सहते गये 
। 
क्योकि चाह थी, फूल को पाने की,
रास्ते में आये, काँटों को हटाने की |

पर जैसे ही हमने, एक फूल को पकड़ा,
काँटों ने हमें, बड़े रोब से था जकड़ा ।
हाथ से छूटकर, फूल नीचे गिर गया,
और उसका तन, पखुड़ियों में बदल गया|

तब पंखुड़ी बोली, हमें भाग्य ने बिखरा दिया,
अपना अस्तित्व , आज हमने खों दिया ।
फूल के समान, क्या हमें सजा पाओगे ?
अपने ग़मों को तुम, क्या भुला पाओगे ?

मिट्टी ही हमारा उदगम है,

इसी  में , जाने  दो  मिल ।
जीवन नहीं आसां 'अल्पी',

शायद यही थी, मेरी मंजिल |  
.........   ''अल्पना मिश्रा''

Wednesday, November 27, 2013

"यादों का आशियाना"

चलो कहीं दूर हम,
एक आशियाना बनायेगें ,
जिसमें अपनी खोई उन,
यादों को सजायेंगे l 

वह भी क्या दौर था जब,
रेत का बनाया हमने घरोंदा ,
पर ठान लिया था लहरों ने ,
हम इसे बहायेंगे l 

वक्त का पता न चला,
कैसे वह गुजर गया ,
एक दूसरे से अपनी ,
हम करते रहे शिकायतें l 


उम्र के इस पड़ाव पर,
जिंदगी ठहर सी गई ,
आहिस्ते-आहिस्ते फिर हम,
मधुर गीत गुनगुनायेगें l


अब तो इस शहर से,
मन अपना है भर गया ,
चलो कहीं फ़ुरसत में,
हाले-दिल सुनायेंगें l

जानें कहाँ गुम हुई "अल्पी",
जहाँ की इस भींड़ में ,
बीते उन लम्हों को ,
दिल में फिर बसायेंगे l

चलो कहीं दूर हम,
एक आशियाना बनायेगें ,
जिसमे अपनी खोई उन,
यादों को सजायेंगे l l
..............''अल्पना मिश्रा ''