कभी सखी सा, कभी पिया सा,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
घनघोर घटायें, रिमझिम फुहारें,
मिट्टी की सौंधी खुशबू ;
मन बरबस, रूमानी हो जाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
प्रकृति में सबकुछ, धुला-धुला सा,
पक्षी दर्शन, उनका कलरव ;
सुखद एहसास, आत्म-विभोर कर जाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
सावन है प्रतिबिम्ब, खुशियों का,
हाथों में मेंहदी, पींगे झूलों कीं ;
नवेली दुल्हन के, प्यार का, पैगाम है लाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
रक्षाबंधन का त्यौहार, तीज का श्रंगार,
‘अल्पी’ तेरे, स्त्रीत्व पर है नाज़ करवाता ;
कभी सखी सा, कभी पिया सा
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
“अल्पना
मिश्रा”

