नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी,
जिसे अब याद करके सोचती, मैं कितनी भोली थी |
सुनी दरवाजे पर दस्तक, जो देखा एक टोली थी,
सभी थे मेरे सहपाठी, नहीं कोई सहेली थी ,
लगे थे रंग चेहरों पर, उन्होंने खेली होली थी,
नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी |
नहीं हम खेलते होली, यही मैं उनसे बोली थी,
लगायेंगे नहीं हम रंग, ये उनकी पहली बोली थी,
छुएंगे पैर और देंगे, मुबारकबाद होली की,
नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी |
झुका एक पैर छूने को,
उन्होंने चाल खेली थी,बटाकर ध्यान पैरों पर,
गुलाल सर पर उड़ेली थी,
समझ न पाई कुछ भी मैं,
अरे मैं इतनी भोली थी,
नहीं जाती भुलाई वो,
जो मेरी पहली होली थी |
चले जब वो गए घर से,
तो मैं निश्चिन्त हो ली थी,
न कोई रंग लगा पाया,
न की कोई ठिठोली थी,
हुआ था जो मगर सच में,
समझ न पाई "भोली थी",
नहीं जाती भुलाई वो,
जो मेरी पहली होली थी |
गया जब हाथ बालों में,
तब समझी रंग की होली थी,
समझ में आने पर तो मैं,
क्रोध से लाल पीली थी,
दे डाली गालियाँ जितनी,
कभी न इतनी बोली थी,
नहीं जाती भुलाई वो,
जो मेरी पहली होली थी |
मगर जब बाद में सोचा,की कुछ मैं ही हठीली थी,
न कोई था कुसूर उनका,न की कोई छिछोली थी,
ये अपनापन था उन सबका,यही है रीत होली की,
नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी |
"अल्पना मिश्रा"
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