
तुम धन्य सुमित्रा माता,
तुमको,करती मैं शत शत नमन,
मुझे समझ नहीं आता,
तुमने कैसे छोड़े होंगे लखन l
जिन आँखों ने बचपन देखा,
होंगे बड़े कब मेरे ललन,
बड़े हुए, ब्याह के लाये,
बने उर्मिला के सजन l
मिले भरत को राजगद्दी,
और राम को दीजे वन,
येसे ही तो थे, माता,
कैकेयी के दो वचन l
सुने वचन जब कैकेयी के,
छोड़ा राजा दशरथ ने तन,
जाने तुम कैसे सह पायी,
अपने प्रियतम का गमन l
राम-सीय ने छोड़ी अयोध्या,
संग गए उनके ही लखन,
कैसे झेला होगा तुमने,
माँ की ममता का दमन l
रहे बीतते चौदह बरस,
कैसे-कैसे करके ज़तन,
देखन को आँखों का तारा,
रहे तरसते तुम्हरे नयन l
निकल गया कठिन समय,
पर टूटने न दिया मन,
अवधपुरी में आ पहुंचे,
सिया-रामजी संग लखन l
पुलकित हो गयी महतारी,
सन्मुख जब पाए लखन,
अपलक निहारती ही रही,
शीतल हुए, ये आज नयन l
तुम धन्य सुमित्रा माता,
तुमको,करती मैं शत शत नमन ll
" अल्पना मिश्रा "
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