Saturday, June 29, 2013

" माँ का उदगार "


तुम धन्य सुमित्रा माता,
तुमको,करती मैं शत शत नमन,
मुझे समझ नहीं आता,
तुमने कैसे छोड़े होंगे लखन l 

जिन आँखों ने बचपन देखा,

होंगे बड़े कब मेरे ललन,
बड़े हुए, ब्याह के लाये,

बने उर्मिला के सजन l

मिले भरत को राजगद्दी,
और राम को दीजे वन,
येसे ही तो थे, माता,
कैकेयी के दो वचन l

सुने वचन जब कैकेयी के,
छोड़ा राजा दशरथ ने तन,
जाने तुम कैसे सह पायी,
अपने प्रियतम का गमन l

राम-सीय ने छोड़ी अयोध्या,  

संग गए उनके ही लखन,
कैसे झेला होगा तुमने,
माँ की ममता का दमन l

रहे बीतते चौदह बरस,
कैसे-कैसे करके ज़तन,
देखन को आँखों का तारा,
रहे तरसते तुम्हरे नयन l



निकल गया कठिन समय,
पर टूटने न दिया मन,
अवधपुरी में आ पहुंचे,
सिया-रामजी संग लखन l

पुलकित हो गयी महतारी,

सन्मुख जब पाए लखन,
अपलक निहारती ही रही,
शीतल हुए, ये आज नयन l

तुम धन्य सुमित्रा माता,
तुमको,करती मैं शत शत नमन ll
               

                 " अल्पना मिश्रा "

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