Wednesday, November 27, 2013

"यादों का आशियाना"

चलो कहीं दूर हम,
एक आशियाना बनायेगें ,
जिसमें अपनी खोई उन,
यादों को सजायेंगे l 

वह भी क्या दौर था जब,
रेत का बनाया हमने घरोंदा ,
पर ठान लिया था लहरों ने ,
हम इसे बहायेंगे l 

वक्त का पता न चला,
कैसे वह गुजर गया ,
एक दूसरे से अपनी ,
हम करते रहे शिकायतें l 


उम्र के इस पड़ाव पर,
जिंदगी ठहर सी गई ,
आहिस्ते-आहिस्ते फिर हम,
मधुर गीत गुनगुनायेगें l


अब तो इस शहर से,
मन अपना है भर गया ,
चलो कहीं फ़ुरसत में,
हाले-दिल सुनायेंगें l

जानें कहाँ गुम हुई "अल्पी",
जहाँ की इस भींड़ में ,
बीते उन लम्हों को ,
दिल में फिर बसायेंगे l

चलो कहीं दूर हम,
एक आशियाना बनायेगें ,
जिसमे अपनी खोई उन,
यादों को सजायेंगे l l
..............''अल्पना मिश्रा ''










Thursday, October 24, 2013

"मेरी बेटी"

बेटी तुम हो बहुत महान ,
करती हूँ मैं तुझे सलाम |

तुम हो चिड़िया मेरे घर की,
फुदकती रहती कोना कोना,
तुमसे दीपित आँगन घर का,
तुम हो प्यारी मेरी सोना |

तुमको जब ना पाती घर में,
लगता है घर सूना सूना ,
यही सोच विह्वल कर जाती,
एक दिन तुमको है उड़ जाना |

जब भी कोई मुस्किल आती,
रखती हो तुम सबका ध्यान ,
भाई, माता और पिता का,
तुम करती सबका सम्मान |

तुम हो मेरे घर की आन,
रखती हूँ मैं इसका मान ,
कोशिश रहती यही हमेशा,
नहीं तुम्हारा हो अपमान |

बेटी इस समाज में तुमको,
क्या-क्या करना पड़ता सहन,
सम्मत जीवन जीने हेतु,
करने पड़ते कितने जतन |

शिक्षा और स्वावलंबन से,
तोड़ दो इस समाज का वहम,
"दहेज़-दानव" जो घूम रहा है,
उसको करना हैं अब ख़तम |

बेटी तुम हो बहुत महान ,
करती हूँ मैं तुझे सलाम |
..........." अल्पना मिश्रा "

“शहीद की माँ की व्यथा”

उस माँ की व्यथा न पूछो,
जिसने खोया, अपना लाल,
कसक बन गये ख्वाब अधूरे,
यादें न दिल से, पाये निकाल ।

बड़ी मन्नतों के बाद,
हुआ था एक, बेटा प्यारा,
बड़े जतनों से उन्होंने,
उसको पाला और संवारा ।

धीरे-धीरे बड़ा हुआ,
माँ की आँखों का तारा,
था वो बहुत हरफनमौला,
मिलनसार और सबसे न्यारा ।

हुई परीक्षा बारहवीं की,
उच्च श्रेणी में कर ली पास,
उसको इन्जीनियर बनाने की,
उनके मन में जगी थी आस ।

एक दिन उन्होने बेटे से पूछा,
क्या बनने की तुम्हारी चाह,
बोला माँ मेरा मन कहता,
“देश की सेवा” सबसे खास ।

दिल पर पत्थर रखकर,
माँ ने सुनी बेटे की बात,
उसकी खुशी सर्वोपरी मान,
दिया सभी ने उसका साथ ।

लगन लगाकर मेहनत की,
रखा लक्ष्य का उसने मान,
हुआ चयन उसका सेना में,
उसने हासिल किया मुकाम ।

हुई नियुक्ति सीमा पर,
चला बढ़ाने देश की शान,
जाते-जाते मुझे कह गया,
माँ-पिता का रखना ध्यान ।

छिड़ी लड़ाई ‘सीमा’ पर,
लिया मोर्चा उसने संभाल,
लिये इरादे फौलादी वह,
दुश्मनों का बन गया “काल“।

लड़ते-लड़ते रणभूमि पर,
दुश्मनों को गिराया मार,
उसने अपनी मातृभूमि का,
सच में फर्ज़ निभाया आज ।

बजी फोन की घंटी जब,
देखा सरहद से था फोन,
बेटा हुआ “शहीद” सुनकर,
हतप्रभ, माँ के भर आये नैन ।

माँ का करुण रुदन सुन,
पिता का हो रहा बुरा हाल,
बार-बार वो यही कह रही,
अब “माँ” कौन बुलायेगा लाल ।

शोकाकुल यह दृश्य देखकर,
आँखें सबकी हो रही नम ।
अपने देश के लाड़ले को,
“श्रध्दांजली” अर्पित करते हैं हम ।
……………….. “अल्पना मिश्रा”

Tuesday, October 22, 2013

“मैं और मेरी जिन्दगी”

जिन्दगी, तू अपने राज,
यूँ बयाँ  न होने दे,
कहीं मैं, तुझसे ही,
नज़र चुरानेलगूं  ।

मुझे तेरी बगिया  के,
फूलों  से  हैबहुत प्यार,
कहीं उनके कांटों से,
मैं घबरानेलगूं

तेरा साथ रहे अरसे  तक,
तमन्ना तो  है  बहुत,
कहीं मौत आने पर,
उससे कतरानेलगूं

मैने बहुत सलीके से,
संजोया है तेरा घर,
कहीं बिन  बताये  उससे,
रुख़सत होनेलगूं

खुशकिस्मत हूं, इस जहाँ से
मिले हैं अज़ीज़ दोस्त,
आशंकित है अल्पी”,
कहीं अपनों से, बिछुड़नेलगूं

.                      “अल्पना मिश्रा

Friday, August 2, 2013

" भारत माँ की व्यथा "


भारत माँ कर रही पुकार,
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अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

हिन्द-पाक बटवारे का,
पहले ही सह चुकी मैं गम ,
ख़ुशी मिली थी आज़ादी की,
पर न रह पायी कायम l
नेताओं ने स्वार्थ की खातिर,
मेरी काया की दो-तार,
भारत माँ कर रही पुकार,
अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

समुचित विकास सुनिश्चित करने,
राज्यों को दिया आकार,
यात्रा शुरू हुई प्रगति की,
कदम बढ़ाये आगे चार l
किन्तु स्वार्थ फिर आड़े आये,
तन पर मेरे चली तलवार,
भारत माँ कर रही पुकार,
अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

देश के सारे नेता मिलकर,
मुझको कर रहे खंड-खंड,
उत्तरा, छत्तीसगढ़, झारखंड,
अब तेलंगाना, बुंदेलखंड l
राजनीति-हित इनका मकसद,
नहीं देश से इनको प्यार,
भारत माँ कर रही पुकार,
अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

हिन्द-पाक बटवारे के,
दुष्परिणाम सभी ने देखे,
यही हाल अब राज्यों का,
हर नेता अपनी रोटी सेंके l
सरहद के अन्दर सरहदों की,
खड़ी कर रहे ये दीवार,
भारत माँ कर रही पुकार,
अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

बहुत थक गयी हूँ इस सबसे,
सुनो देश के कर्णधार ,
ऊपर उठो स्वार्थ से अपने,
माँ को मत समझो व्यापार l
उन्नति के सोपान बनो अब,
जिससे हो सबका उद्धार,
भारत माँ कर रही पुकार,

अब करो न, मुझ पर अत्याचार l
........ "अल्पना मिश्रा"

" ख्वाहिशें "

ख्वाहिशें होती, बहुत प्रबल,
इन पर नहीं चलता है बल,
करने पढ़ते हैं, बहुत जतन,
फिर भी न, मन से पाए निकल l

भटकातीं रहतीं हैं मन को,
जाने क्या-क्या ख्वाब दिखातीं,
नाच नचातीं रहतीं मन को,
अपने ही मन की करवातीं l

ख्वाहिश जब पूरी न होती,
मन को ये विह्वल कर जाती,
मन माफिक जो चला न इनके,
उसी का सारा दोष बताती l

बहुत घुमाया, जग में तुमने,
कभी न स्थिर रहना जानी,
मूरख "ख्वाहिश", मत कर मन की,
बड़ी मुश्किल से, मिली जिंदगानी l

अब मैं लौटी, उस धाम में,
जहाँ न झूठी शान दिखानी,
कर्म करो, "गुरु" आज्ञा मानो,
सार्थक हो, जीवन की कहानी l
...... " अल्पना मिश्रा "

Wednesday, July 10, 2013

" जीने का सलीका "

मुस्कराते चेहरे से,
हर दर्द छुपाना है,
सब कुछ बोलकर भी,
कुछ नहीं बताना है l 

कभी न रूठो किसी से,
पर सबको मनाना है,
नेकी करें हमेशा ,
पर इसको न जताना है l 

मन शांत हो हमेशा ,
यही  दिल में बसाना है,
जीने के सलीके का ,
यही राज पुराना है  l

........ " अल्पना मिश्रा "

Sunday, July 7, 2013

" फेस बुक "






फेस बुक, स्वीकार करो तुम,
हृदय से धन्यवाद हमारा,
तुम्हारे कारण ही हाथ में,
खोई कलम, आई है दुबारा l

पहले मिली नहीं थी तुमसे,
नाम सुना था बहुत तुम्हारा,
कुछ लोगों से सुनी बुराई,
मिलने को न मन था गवारा l

इन्टरनेट लगा जब घर पर,
अन्तर्द्वन्द्व में, आई. डी. बनाई,
डरी-डराई थी मैं तुमसे,
मिलने पर, जानी अच्छाई l

मिलवाती रहती अपनों से,
देश-विदेश की, खबर बताती,
विचार दिखाती अच्छे-अच्छे,
देखे बिन तुम्हें, चैन न पाती l

अब जाना दो पहलू तुम्हारे,
कुछ अच्छाई, कुछ है बुराई,
मुझे दिखी अच्छाई तुममे,
इसलिए तुम्हें, देती हूँ बधाई

                  " अल्पना मिश्रा "

Friday, July 5, 2013

" त्रासदी में राजनीति "


देश के जिम्मेदार नेताओ,
अब तो करो शर्म,
उत्तराखंड की तबाही पर,
तू-तू , मैं-मैं करो बंद l

अगर कुछ इंसानियत है तो,
वहां फंसे, लोगों को बचाओ ,

अपना फ़र्ज़ निभाकर,
कुछ दया-धर्म तो दिखलाओ l

उन खामोश वादियों में,
लगा है लाशों का अम्बार,
उनकी आत्मा-शांति के लिए,
करवाएं उनके दाह-संस्कार l

बाग़डोर जिनको दी देश की,
वही कर रहे बंटाढार,
भ्रष्टाचार चरम सीमा पर,
जनता बेबस और लाचार l

कोलाहल करते संसद में,
चप्पल-कुर्सी से करते वार,
क्या-क्या दिखा रहे दुनियां को,
कहाँ गए सारे संस्कार l

याद करो उन नेताओं को,
जिनसे देश हुआ आज़ाद,
गाँधी, तिलक, आज़ाद, भगत सिंह,
उनकी कुर्बानी न हो बर्बाद l

जनता जाग गई है देश की,
अब न सहेगी अत्याचार,
सुधर जाओ नेताओं अब तुम,
बनो प्रगति के सूत्रधार ll
        
            
             " अल्पना मिश्रा "

Sunday, June 30, 2013

" उज्जवल भविष्य "

अतीत के पहाड़ पर ,
उन यादों को याद कर ,
न समय अपना बर्बाद कर । 

क्या हासिल करना चाहते हो ?

वर्तमान अपना सँवार कर ,
आसमान सी ऊँचाइयों पर ,
एक नया युग निर्माण कर । 

चुनौतियों से न घबराओ ,
भविष्य अपना बनाओ ,
चहुँ ओर जगमगाओ ।  

                " अल्पना मिश्रा "  

Saturday, June 29, 2013

" चंचल मन "




अपने मन को आज टटोलें,
जाने कितने, राज ये खोलें l 

ये मन बड़ा ही है चंचल,
भटकता रहता है पल पल, 
इस पर रखना है अंकुश,
बेकाबू हो जाये कल   
कुछ ऐसी तरकीब निकालें ,
जिससे इसको रखे संभाले ,
वरना कितने राज ये खोले,
अपने मन को आज टटोलें

ये मन कितना पापी है,
कितने ही इस पर हावी हैं,
कितनों पर था ये आया ,
बन सका कोई साथी है
देनी पड़ेगी इसे परीक्षा,
ऐसी प्रभु की इच्छा बोले,
जाने कितने राज ये खोले,
अपने मन को आज टटोलें

अपने मन मंदिर में जाऊं,
प्रभु चरणों में शीश झुकाऊ,
हो जाये ये साफ़ सुथरा ,
रहे इसमें कोई दूसरा,
ऐसा हो मेरे "मन" का काम,
जिसमे हों केवल "श्रीराम"
             
            " अल्पना मिश्रा "



" मेरी पहली होली "



नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी,
जिसे अब याद करके सोचती, मैं कितनी भोली थी |

सुनी दरवाजे पर दस्तक, जो देखा एक टोली थी,
सभी थे मेरे सहपाठी, नहीं कोई सहेली थी ,
लगे थे रंग चेहरों पर, उन्होंने खेली होली थी,
नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी |

नहीं हम खेलते होली, यही मैं उनसे बोली थी,
लगायेंगे नहीं हम रंग, ये उनकी पहली बोली थी,
छुएंगे पैर और देंगे, मुबारकबाद होली की,
नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी |

झुका एक पैर छूने को,

उन्होंने चाल खेली थी,
बटाकर ध्यान पैरों पर,

गुलाल सर पर उड़ेली थी,
समझ न पाई कुछ भी मैं,

अरे मैं इतनी भोली थी,
नहीं जाती भुलाई वो,

जो मेरी पहली होली थी |

चले जब वो गए घर से,

तो मैं निश्चिन्त हो ली थी,
न कोई रंग लगा पाया,

न की कोई ठिठोली थी,
हुआ था जो मगर सच में,

समझ न पाई "भोली थी",
नहीं जाती भुलाई वो,

जो मेरी पहली होली थी |

गया जब हाथ बालों में,

तब समझी रंग की होली थी,
समझ में आने पर तो मैं,

क्रोध से लाल पीली थी,
दे डाली गालियाँ जितनी,

कभी न इतनी बोली थी,
नहीं जाती भुलाई वो,

जो मेरी पहली होली थी |

मगर जब बाद में सोचा,
की कुछ मैं ही हठीली थी,
न कोई था कुसूर उनका,न की कोई छिछोली थी,
ये अपनापन था उन सबका,यही है रीत होली की,
नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी |
                                  "अल्पना मिश्रा" 

" मुझे आज मुझसे, मिला गया कोई "







आज मुझे ख्वाबों में,
जगा गया कोई,
मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |

मधुवन की कली हूँ मैं,
आकर बता गया कोई,
मुझे मेरी मासूमियत ,
दिखा गया कोई,
मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |

पूनम की चांदनी रात में,        

दूध से नहला गया कोई,
मस्त हवा के झौंकों से,
मुझे महका गया कोई,
मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |

सुबह सूरज की किरणों में,

मुझे खिला गया कोई,
फूल बन जाने पर,
जीना सिखा गया कोई,                  

मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |

तूफानी हवाओं में,
मुझे बिखरा गया कोई,
बिखर जाने पर,
जीवन का मतलब,
समझा गया कोई |
आज मुझे ख्वाबों में,
जगा गया कोई,
मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |


      "अल्पना मिश्रा" 

" ये जिन्दगी "





ये जिन्दगी,
हसीन है जितनी,
उतना ही,
उसमे गम है |
इसमें हम,
हँस लें,

जितना,
उतना ही कम है |

हम इसमें,
जितना उलझे,
उतनी ही,
आँखें नम है |

जाएँ शरण में,
प्रभु की,
इस बात में,
ही दम है |

इसलिए,
जिन्दगी देने वाले से,
प्यार कर |
जो सत्य है,
उसे ही,
स्वीकार कर |
      
      "अल्पना मिश्रा"