तमन्ना थी दिल में,
फूल पाने की,
और अपने जीवन में,
उनकों सजाने की |
चले थे हम, काँटों भरी राह,
अपनी मंजिल को तलाशने ।
काँटों ही काँटों से, घिरे हुए हम ,
निकले थे फूल को, हासिल करने |
कांटे दर कांटे, चुभते गए ,
हम अपने दर्द को सहते गये ।
क्योकि चाह थी, फूल को पाने की,
रास्ते में आये, काँटों को हटाने की |
पर जैसे ही हमने, एक फूल को पकड़ा,
काँटों ने हमें, बड़े रोब से था जकड़ा ।
हाथ से छूटकर, फूल नीचे गिर गया,
और उसका तन, पखुड़ियों में बदल गया|
तब पंखुड़ी बोली, हमें भाग्य ने बिखरा दिया,
अपना अस्तित्व , आज हमने खों दिया ।
फूल के समान, क्या हमें सजा पाओगे ?
अपने ग़मों को तुम, क्या भुला पाओगे ?
मिट्टी ही हमारा उदगम है,
इसी में , जाने दो मिल ।
जीवन नहीं आसां 'अल्पी',
शायद यही थी, मेरी मंजिल |
फूल पाने की,
और अपने जीवन में,
उनकों सजाने की |चले थे हम, काँटों भरी राह,
अपनी मंजिल को तलाशने ।
काँटों ही काँटों से, घिरे हुए हम ,
निकले थे फूल को, हासिल करने |
कांटे दर कांटे, चुभते गए ,
हम अपने दर्द को सहते गये ।
क्योकि चाह थी, फूल को पाने की,
रास्ते में आये, काँटों को हटाने की |
पर जैसे ही हमने, एक फूल को पकड़ा,
काँटों ने हमें, बड़े रोब से था जकड़ा ।
हाथ से छूटकर, फूल नीचे गिर गया,
और उसका तन, पखुड़ियों में बदल गया|
तब पंखुड़ी बोली, हमें भाग्य ने बिखरा दिया,
अपना अस्तित्व , आज हमने खों दिया ।
फूल के समान, क्या हमें सजा पाओगे ?
अपने ग़मों को तुम, क्या भुला पाओगे ?
मिट्टी ही हमारा उदगम है,
इसी में , जाने दो मिल ।
जीवन नहीं आसां 'अल्पी',
शायद यही थी, मेरी मंजिल |
......... ''अल्पना मिश्रा''