Sunday, June 30, 2013

" उज्जवल भविष्य "

अतीत के पहाड़ पर ,
उन यादों को याद कर ,
न समय अपना बर्बाद कर । 

क्या हासिल करना चाहते हो ?

वर्तमान अपना सँवार कर ,
आसमान सी ऊँचाइयों पर ,
एक नया युग निर्माण कर । 

चुनौतियों से न घबराओ ,
भविष्य अपना बनाओ ,
चहुँ ओर जगमगाओ ।  

                " अल्पना मिश्रा "  

Saturday, June 29, 2013

" चंचल मन "




अपने मन को आज टटोलें,
जाने कितने, राज ये खोलें l 

ये मन बड़ा ही है चंचल,
भटकता रहता है पल पल, 
इस पर रखना है अंकुश,
बेकाबू हो जाये कल   
कुछ ऐसी तरकीब निकालें ,
जिससे इसको रखे संभाले ,
वरना कितने राज ये खोले,
अपने मन को आज टटोलें

ये मन कितना पापी है,
कितने ही इस पर हावी हैं,
कितनों पर था ये आया ,
बन सका कोई साथी है
देनी पड़ेगी इसे परीक्षा,
ऐसी प्रभु की इच्छा बोले,
जाने कितने राज ये खोले,
अपने मन को आज टटोलें

अपने मन मंदिर में जाऊं,
प्रभु चरणों में शीश झुकाऊ,
हो जाये ये साफ़ सुथरा ,
रहे इसमें कोई दूसरा,
ऐसा हो मेरे "मन" का काम,
जिसमे हों केवल "श्रीराम"
             
            " अल्पना मिश्रा "



" मेरी पहली होली "



नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी,
जिसे अब याद करके सोचती, मैं कितनी भोली थी |

सुनी दरवाजे पर दस्तक, जो देखा एक टोली थी,
सभी थे मेरे सहपाठी, नहीं कोई सहेली थी ,
लगे थे रंग चेहरों पर, उन्होंने खेली होली थी,
नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी |

नहीं हम खेलते होली, यही मैं उनसे बोली थी,
लगायेंगे नहीं हम रंग, ये उनकी पहली बोली थी,
छुएंगे पैर और देंगे, मुबारकबाद होली की,
नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी |

झुका एक पैर छूने को,

उन्होंने चाल खेली थी,
बटाकर ध्यान पैरों पर,

गुलाल सर पर उड़ेली थी,
समझ न पाई कुछ भी मैं,

अरे मैं इतनी भोली थी,
नहीं जाती भुलाई वो,

जो मेरी पहली होली थी |

चले जब वो गए घर से,

तो मैं निश्चिन्त हो ली थी,
न कोई रंग लगा पाया,

न की कोई ठिठोली थी,
हुआ था जो मगर सच में,

समझ न पाई "भोली थी",
नहीं जाती भुलाई वो,

जो मेरी पहली होली थी |

गया जब हाथ बालों में,

तब समझी रंग की होली थी,
समझ में आने पर तो मैं,

क्रोध से लाल पीली थी,
दे डाली गालियाँ जितनी,

कभी न इतनी बोली थी,
नहीं जाती भुलाई वो,

जो मेरी पहली होली थी |

मगर जब बाद में सोचा,
की कुछ मैं ही हठीली थी,
न कोई था कुसूर उनका,न की कोई छिछोली थी,
ये अपनापन था उन सबका,यही है रीत होली की,
नहीं जाती भुलाई वो, जो मेरी पहली होली थी |
                                  "अल्पना मिश्रा" 

" मुझे आज मुझसे, मिला गया कोई "







आज मुझे ख्वाबों में,
जगा गया कोई,
मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |

मधुवन की कली हूँ मैं,
आकर बता गया कोई,
मुझे मेरी मासूमियत ,
दिखा गया कोई,
मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |

पूनम की चांदनी रात में,        

दूध से नहला गया कोई,
मस्त हवा के झौंकों से,
मुझे महका गया कोई,
मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |

सुबह सूरज की किरणों में,

मुझे खिला गया कोई,
फूल बन जाने पर,
जीना सिखा गया कोई,                  

मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |

तूफानी हवाओं में,
मुझे बिखरा गया कोई,
बिखर जाने पर,
जीवन का मतलब,
समझा गया कोई |
आज मुझे ख्वाबों में,
जगा गया कोई,
मुझे आज मुझसे,
मिला गया कोई |


      "अल्पना मिश्रा" 

" ये जिन्दगी "





ये जिन्दगी,
हसीन है जितनी,
उतना ही,
उसमे गम है |
इसमें हम,
हँस लें,

जितना,
उतना ही कम है |

हम इसमें,
जितना उलझे,
उतनी ही,
आँखें नम है |

जाएँ शरण में,
प्रभु की,
इस बात में,
ही दम है |

इसलिए,
जिन्दगी देने वाले से,
प्यार कर |
जो सत्य है,
उसे ही,
स्वीकार कर |
      
      "अल्पना मिश्रा"

" माँ का उदगार "


तुम धन्य सुमित्रा माता,
तुमको,करती मैं शत शत नमन,
मुझे समझ नहीं आता,
तुमने कैसे छोड़े होंगे लखन l 

जिन आँखों ने बचपन देखा,

होंगे बड़े कब मेरे ललन,
बड़े हुए, ब्याह के लाये,

बने उर्मिला के सजन l

मिले भरत को राजगद्दी,
और राम को दीजे वन,
येसे ही तो थे, माता,
कैकेयी के दो वचन l

सुने वचन जब कैकेयी के,
छोड़ा राजा दशरथ ने तन,
जाने तुम कैसे सह पायी,
अपने प्रियतम का गमन l

राम-सीय ने छोड़ी अयोध्या,  

संग गए उनके ही लखन,
कैसे झेला होगा तुमने,
माँ की ममता का दमन l

रहे बीतते चौदह बरस,
कैसे-कैसे करके ज़तन,
देखन को आँखों का तारा,
रहे तरसते तुम्हरे नयन l



निकल गया कठिन समय,
पर टूटने न दिया मन,
अवधपुरी में आ पहुंचे,
सिया-रामजी संग लखन l

पुलकित हो गयी महतारी,

सन्मुख जब पाए लखन,
अपलक निहारती ही रही,
शीतल हुए, ये आज नयन l

तुम धन्य सुमित्रा माता,
तुमको,करती मैं शत शत नमन ll
               

                 " अल्पना मिश्रा "

" आज के नेता "

आज के ये "नेता", किस मिट्टी से बन रहे हैं,
भूलकर  इंसानियत,  इंसानों को  छल रहे हैं l 

वाकई ये नेता कितने,

बेशर्म   हो रहे  हैं,
मिलते ही वोट हमसे,
वह दूर हो रहे हैं l 

मंहगाई की मार से हम,

हलाकान हो रहे हैं,
करुणा  विहीन  नेता,

चुपचाप   सो रहे  हैं l 

क़र्ज़  के  कहर  से,

किसान  जल रहे हैं,
कुर्सी के लोभ में ये,

कुछ कह नहीं रहे हैं l

हर रोज़ बालिकाओं के, बलात्कार हो रहे हैं,
उसमे भी निर्दयी नेता, राजनीति कर रहे हैं l

मंदिर-मस्जिद के नाम पर , विवाद कर रहे हैं,
हम भाइयों के दिल में, नफरत ये भर रहे हैं l

दंगों से सहमे लोग, रातों रात जग रहे हैं,
दंगों की जड़ ये नेता, गुमराह कर रहे हैं l

भगवान् के घर देर है, ये अंधेर कर रहे हैं
इनको सजा मिलेगी, हम सब्र कर रहे हैं l
                           

                     " अल्पना मिश्रा "

" मुस्कराना "

नहीं कुछ खर्च होता है,
किसी का मुस्कराने से,
मगर धनवान हो जाता,
इसे हर सख्स पाने से l 

ये लेती सिर्फ है, इक पल,
हमारी जिंदगानी से,
ख़ुशी से झूम जाये दिल,
मगर इस पल को पाने से l

कभी तो इस कदर इसका,
असर हो जाए पाने से,
कि यादे दिल से, याद इसकी,
नहीं जाती भुलाने से l

ये जीवन ख़ास बनता है,
ख़ुशी के पल बनाने से,
सहज ही पल, ये बनते हैं,
किसी के मुस्कराने से ll
          

         " अल्पना मिश्रा "

" माँ "

                                                                                                                      


माँ तुम बहुत याद आती हो,
मैं उन यादों को,
संजोया करती हूँ l

माँ तुम वह एहसास हो,
जिसे मैं हमेशा,
महसूस करती हूँ,
माँ तुम वह आवाज़ हो,
जिसे मैं तनहाइयों में,
सुना करती हूँ l

माँ तुम सरल स्वभाव हो,
जिसमे ढलने का,
हमेशा प्रयास करती हूँ,
तुमने जो रास्ते दिखाए,
उनका ही मैं,
अनुशरण करती हूँ l

जीवन की कठिनाइयों को,
तुम्हारे सहज अंदाज़ से,
समझा करती हूँ,
फिर भी पता नहीं क्यों,
इस जिन्दगी से,
घबराया करती हूँ l

माँ तुम वो "कोहिनूर" हो,
जिसके खोने पर आज,
उसकी चमक, समझ पाती हूँ,
और "माँ" बनने के बाद,
तुम्हारी भावनाओं को,
सजीव देखा करती हूँ l

माँ तुम बहुत याद आती हो,
मैं उन यादों को,
संजोया करती हूँ l

           
          "अल्पना मिश्रा"

" वह कली जो, खिलने से पूर्व ही मुरझा गयी "


वह कली जो,
खिलने से पूर्व ही
मुरझा गयी l


अपने होठों से,
कुछ कहना 
चाह रही थी,
पर पता नहीं क्यों 
कह नहीं पा रही थी l
वह कली जो,
खिलने से पूर्व ही
मुरझा गयी l

उसका चेहरा
बुझा हुआ था,
जिसको मुस्करा कर,
छिपाने का प्रयास 
कर रही थी l
वह कली जो,
खिलने से पूर्व ही
मुरझा गयी l

शायद "कली" ने तो
"भँवरे" को मोह लिया था,
पर तेज़ हवा के झोंकों से
काँटों ने उसको
गोद दिया था l
वह कली जो,
खिलने से पूर्व ही
मुरझा गयी ll


 "अल्पना मिश्रा"


" मनभावन मौसम "


उमड़ घुमड़ कर आये बदरा,
घन घोर घटाएं छाई ,
प्रफुल्लित हुआ मन,
वर्षा ऋतु है आई l

आनंदित हो मोरों ने,
पंखों से छटा बिखराई,
नृत्य कर उन्होंने ,
सारी शक्ति है दिखलाई l


ठलाती-बलखाती बदलियाँ,
मदहोशी में आईं,
मानो आकर सारी मधु,
धरा पर है बरसाई l

हर्षित हुए मेंढक भी,
झींगरों ने मस्ती पाई,
लगा मानो जैसे,
कोई बरात है आई l

त्रण, पर्ण , प्रसूनों पर,
बूँद-बूँद है छायी,
ये कैसी अनोखी छटा,
मन को है भायी l

गरज-गरज इतना बरसी,
नदियों ने ली अंगड़ाई,
तृप्त हुयी धरा भी,
हरियाली है छाई l

बच्चों की टोली में,
हर्ष उमंग है समाई,
रिमझिम बूंदों में नहाकर,
उछल कूंद है मचाई l

हुआ सुहाना मौसम,
प्रिय की याद है आई,
अधीर हुए मन,
प्रेम ऋतु है आई ll
      

     " अल्पना मिश्रा " 

" ह्रदयविदारक घटना "


उत्तराखंड का मंजर देखा,
केदारनाथ का वह कहर देखा l

श्रद्धालुओं को जाते देखा ,
पर, लौटकर न आते देखा,

कल तक सुंदर तीर्थ था जहाँ,

श्मशान में बदलते देखा l

एक ऐसा सैलाब था आया,
मानो डायनासौर है आया,
जिसको उसने सामने पाया,
सबको अपना ग्रास बनाया l

अकल्पनीय हादसा था यह,
किंकर्तव्य विमूढ़ कर गया !
कुछ ने तो अपनों को बचाया,
कितनों ने सर्वस्व गँवाया l

लगता है, अब इस धरती पर,
कलंक का इतना बढ़ गया भार,
मानो जैसे पाप के आगे,
पुण्य की, हो रही है हार l

वृद्धों को यदि मोक्ष दिलाया,
पर बच्चों ने क्या था बिगाड़ा ?
बगिया के थे फूल हमारे,
उनको तुमने क्यों है उजाड़ा ?

भगवन अब विनती ये हमारी
ऐसा अनर्थ, कभी न करना,
गोद भरी यदि माँ की तुमने,
उसे कभी सूनी न करना l

              
           " अल्पना मिश्रा "