Wednesday, August 22, 2018

सुहावना सावन


कभी सखी सा, कभी पिया सा,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

घनघोर घटायें, रिमझिम फुहारें,
मिट्टी की सौंधी खुशबू ;
मन बरबस, रूमानी हो जाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

प्रकृति में सबकुछ, धुला-धुला सा,
पक्षी दर्शन, उनका कलरव ;
सुखद एहसास, आत्म-विभोर कर जाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

सावन है प्रतिबिम्ब, खुशियों का,
हाथों में मेंहदी, पींगे झूलों कीं ;
नवेली दुल्हन के, प्यार का, पैगाम है लाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

रक्षाबंधन का त्यौहार, तीज का श्रंगार,
‘अल्पी’ तेरे, स्त्रीत्व पर है नाज़ करवाता ;
कभी सखी सा, कभी पिया सा
सावन मुझको बहुत सुहाता ।

                        “अल्पना मिश्रा”

Friday, August 17, 2018

मेरी ‘अभिव्यक्ति’ तुम


मेरी   शक्ति  में ,
मेरी   भक्ति   में ,
मेरी तपस्या में , हरदम
मेरी अभिव्यक्ति तुम l


       मेरी   साधना  में ,
       मेरी  आराधना  में ,
       मेरी भावनाओं में , हरदम
       मेरी अभिव्यक्ति तुम l

  मेरी   सांसो  में ,
  मेरे   अहसांसो   में ,
  मेरेअंतर्मन’ की गहराइयों में , हरदम
  मेरी अभिव्यक्ति तुम l


            मेरे  खयालो   में ,
            मेरे  सवालों   में ,
            मेरी तन्हाइयों में , हरदम
            मेरी अभिव्यक्ति तुम l

मेरी   आशा   में ,
जीवन की परिभाषा में ,
तुम्हारे बिन  अल्पी’ ,  बेकस ”
मेरी अभिव्यक्ति तुम l

  “अल्पना मिश्रा”