Friday, August 2, 2013

" भारत माँ की व्यथा "


भारत माँ कर रही पुकार,
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अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

हिन्द-पाक बटवारे का,
पहले ही सह चुकी मैं गम ,
ख़ुशी मिली थी आज़ादी की,
पर न रह पायी कायम l
नेताओं ने स्वार्थ की खातिर,
मेरी काया की दो-तार,
भारत माँ कर रही पुकार,
अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

समुचित विकास सुनिश्चित करने,
राज्यों को दिया आकार,
यात्रा शुरू हुई प्रगति की,
कदम बढ़ाये आगे चार l
किन्तु स्वार्थ फिर आड़े आये,
तन पर मेरे चली तलवार,
भारत माँ कर रही पुकार,
अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

देश के सारे नेता मिलकर,
मुझको कर रहे खंड-खंड,
उत्तरा, छत्तीसगढ़, झारखंड,
अब तेलंगाना, बुंदेलखंड l
राजनीति-हित इनका मकसद,
नहीं देश से इनको प्यार,
भारत माँ कर रही पुकार,
अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

हिन्द-पाक बटवारे के,
दुष्परिणाम सभी ने देखे,
यही हाल अब राज्यों का,
हर नेता अपनी रोटी सेंके l
सरहद के अन्दर सरहदों की,
खड़ी कर रहे ये दीवार,
भारत माँ कर रही पुकार,
अब करो न, मुझ पर अत्याचार l

बहुत थक गयी हूँ इस सबसे,
सुनो देश के कर्णधार ,
ऊपर उठो स्वार्थ से अपने,
माँ को मत समझो व्यापार l
उन्नति के सोपान बनो अब,
जिससे हो सबका उद्धार,
भारत माँ कर रही पुकार,

अब करो न, मुझ पर अत्याचार l
........ "अल्पना मिश्रा"

" ख्वाहिशें "

ख्वाहिशें होती, बहुत प्रबल,
इन पर नहीं चलता है बल,
करने पढ़ते हैं, बहुत जतन,
फिर भी न, मन से पाए निकल l

भटकातीं रहतीं हैं मन को,
जाने क्या-क्या ख्वाब दिखातीं,
नाच नचातीं रहतीं मन को,
अपने ही मन की करवातीं l

ख्वाहिश जब पूरी न होती,
मन को ये विह्वल कर जाती,
मन माफिक जो चला न इनके,
उसी का सारा दोष बताती l

बहुत घुमाया, जग में तुमने,
कभी न स्थिर रहना जानी,
मूरख "ख्वाहिश", मत कर मन की,
बड़ी मुश्किल से, मिली जिंदगानी l

अब मैं लौटी, उस धाम में,
जहाँ न झूठी शान दिखानी,
कर्म करो, "गुरु" आज्ञा मानो,
सार्थक हो, जीवन की कहानी l
...... " अल्पना मिश्रा "