कोयलिया तुम हो , काली काली
l
भोर भये आँगन में , जब टेर लगाती l
मेरे
मन को , तुम बहुत लुभाती ll
फुदक -फुदक कर , डाली डाली पर l
‘साँवरे’
की तरह , तुम बहुत सताती ll
कूक -कूक कर , मुझे बताती l
मैं हूँ
तेरे , ‘कान्हा’ की मतवाली ll
कूक सुन ‘अल्पी’ , व्याकुल हो जाती l
मानो
बज उठी , मेरे “प्रीतम” की बांसुरी ll
कोयलिया तुम हो , काली काली l
जैसे
‘श्याम रंग’ में , रंगी श्यामली ll
“अल्पना मिश्रा”
