ख्वाहिशें होती, बहुत प्रबल,
इन पर नहीं चलता है बल,
करने पढ़ते हैं, बहुत जतन,
फिर भी न, मन से पाए निकल l
भटकातीं रहतीं हैं मन को,
जाने क्या-क्या ख्वाब दिखातीं,
नाच नचातीं रहतीं मन को,
अपने ही मन की करवातीं l
ख्वाहिश जब पूरी न होती,
मन को ये विह्वल कर जाती,
मन माफिक जो चला न इनके,
उसी का सारा दोष बताती l
बहुत घुमाया, जग में तुमने,
कभी न स्थिर रहना जानी,
मूरख "ख्वाहिश", मत कर मन की,
बड़ी मुश्किल से, मिली जिंदगानी l
अब मैं लौटी, उस धाम में,
जहाँ न झूठी शान दिखानी,
कर्म करो, "गुरु" आज्ञा मानो,
सार्थक हो, जीवन की कहानी l
...... " अल्पना मिश्रा "
इन पर नहीं चलता है बल,
करने पढ़ते हैं, बहुत जतन,
फिर भी न, मन से पाए निकल l
भटकातीं रहतीं हैं मन को,
जाने क्या-क्या ख्वाब दिखातीं,
नाच नचातीं रहतीं मन को,
अपने ही मन की करवातीं l
ख्वाहिश जब पूरी न होती,
मन को ये विह्वल कर जाती,
मन माफिक जो चला न इनके,
उसी का सारा दोष बताती l
बहुत घुमाया, जग में तुमने,
कभी न स्थिर रहना जानी,
मूरख "ख्वाहिश", मत कर मन की,
बड़ी मुश्किल से, मिली जिंदगानी l
अब मैं लौटी, उस धाम में,
जहाँ न झूठी शान दिखानी,
कर्म करो, "गुरु" आज्ञा मानो,
सार्थक हो, जीवन की कहानी l
...... " अल्पना मिश्रा "
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