Thursday, October 24, 2013

“शहीद की माँ की व्यथा”

उस माँ की व्यथा न पूछो,
जिसने खोया, अपना लाल,
कसक बन गये ख्वाब अधूरे,
यादें न दिल से, पाये निकाल ।

बड़ी मन्नतों के बाद,
हुआ था एक, बेटा प्यारा,
बड़े जतनों से उन्होंने,
उसको पाला और संवारा ।

धीरे-धीरे बड़ा हुआ,
माँ की आँखों का तारा,
था वो बहुत हरफनमौला,
मिलनसार और सबसे न्यारा ।

हुई परीक्षा बारहवीं की,
उच्च श्रेणी में कर ली पास,
उसको इन्जीनियर बनाने की,
उनके मन में जगी थी आस ।

एक दिन उन्होने बेटे से पूछा,
क्या बनने की तुम्हारी चाह,
बोला माँ मेरा मन कहता,
“देश की सेवा” सबसे खास ।

दिल पर पत्थर रखकर,
माँ ने सुनी बेटे की बात,
उसकी खुशी सर्वोपरी मान,
दिया सभी ने उसका साथ ।

लगन लगाकर मेहनत की,
रखा लक्ष्य का उसने मान,
हुआ चयन उसका सेना में,
उसने हासिल किया मुकाम ।

हुई नियुक्ति सीमा पर,
चला बढ़ाने देश की शान,
जाते-जाते मुझे कह गया,
माँ-पिता का रखना ध्यान ।

छिड़ी लड़ाई ‘सीमा’ पर,
लिया मोर्चा उसने संभाल,
लिये इरादे फौलादी वह,
दुश्मनों का बन गया “काल“।

लड़ते-लड़ते रणभूमि पर,
दुश्मनों को गिराया मार,
उसने अपनी मातृभूमि का,
सच में फर्ज़ निभाया आज ।

बजी फोन की घंटी जब,
देखा सरहद से था फोन,
बेटा हुआ “शहीद” सुनकर,
हतप्रभ, माँ के भर आये नैन ।

माँ का करुण रुदन सुन,
पिता का हो रहा बुरा हाल,
बार-बार वो यही कह रही,
अब “माँ” कौन बुलायेगा लाल ।

शोकाकुल यह दृश्य देखकर,
आँखें सबकी हो रही नम ।
अपने देश के लाड़ले को,
“श्रध्दांजली” अर्पित करते हैं हम ।
……………….. “अल्पना मिश्रा”

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