कोयलिया तुम हो , काली काली
l
भोर भये आँगन में , जब टेर लगाती l
मेरे
मन को , तुम बहुत लुभाती ll
फुदक -फुदक कर , डाली डाली पर l
‘साँवरे’
की तरह , तुम बहुत सताती ll
कूक -कूक कर , मुझे बताती l
मैं हूँ
तेरे , ‘कान्हा’ की मतवाली ll
कूक सुन ‘अल्पी’ , व्याकुल हो जाती l
मानो
बज उठी , मेरे “प्रीतम” की बांसुरी ll
कोयलिया तुम हो , काली काली l
जैसे
‘श्याम रंग’ में , रंगी श्यामली ll
“अल्पना मिश्रा”

कोयलिया से नाता
ReplyDeleteहमको मन भाता।।।
बहुत खूब लिखतीं हैं धन्यवाद।
Dhanyawad ji🙏
ReplyDeleteKoyaliya me shyamli ki anubhuti atyant adbhut aur Manmohan hai.🙏🙏....shraddha
ReplyDeleteSuperb kya bat he didi very nice
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