कभी सखी सा, कभी पिया सा,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
घनघोर घटायें, रिमझिम फुहारें,
मिट्टी की सौंधी खुशबू ;
मन बरबस, रूमानी हो जाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
प्रकृति में सबकुछ, धुला-धुला सा,
पक्षी दर्शन, उनका कलरव ;
सुखद एहसास, आत्म-विभोर कर जाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
सावन है प्रतिबिम्ब, खुशियों का,
हाथों में मेंहदी, पींगे झूलों कीं ;
नवेली दुल्हन के, प्यार का, पैगाम है लाता,
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
रक्षाबंधन का त्यौहार, तीज का श्रंगार,
‘अल्पी’ तेरे, स्त्रीत्व पर है नाज़ करवाता ;
कभी सखी सा, कभी पिया सा
सावन मुझको बहुत सुहाता ।
“अल्पना
मिश्रा”

महिला होने का गुरूत्व
ReplyDeleteहमे भी भाव विभोर कर गया
महिला वर्ग के प्रति समर्पित सम्मान
का आलम ये हमारा इ-मेल है जिसकी शुरूआत हमारी दीदी के नाम से हुई 'दिल' तो हम हैं ही
धन्यवाद
Dhanyawad bhai ji
DeleteAdbhoot, proud of u
ReplyDeleteSister, app itni acchi poet hai, Hume to aaj pata chala....my regards....🙏🙏🙏 dr.Dharmesh
बहोत ही सुन्दर रचना
ReplyDeleteDhanyabad Bhai ji
DeleteSavan me man ki Dasha ka bahut khoobsurat varnan Kiya hai aapne didi .🙏🙏shraddha
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