Tuesday, February 4, 2014

मेरी मंजिल

तमन्ना थी दिल में,
फूल  पाने  की,
और अपने जीवन में,

उनकों सजाने की |

चले थे हम, काँटों भरी राह,
अपनी मंजिल को तलाशने 
। 
काँटों ही काँटों से, घिरे हुए हम ,
निकले थे फूल को, हासिल करने |

कांटे दर कांटे, चुभते गए ,
हम अपने दर्द को सहते गये 
। 
क्योकि चाह थी, फूल को पाने की,
रास्ते में आये, काँटों को हटाने की |

पर जैसे ही हमने, एक फूल को पकड़ा,
काँटों ने हमें, बड़े रोब से था जकड़ा ।
हाथ से छूटकर, फूल नीचे गिर गया,
और उसका तन, पखुड़ियों में बदल गया|

तब पंखुड़ी बोली, हमें भाग्य ने बिखरा दिया,
अपना अस्तित्व , आज हमने खों दिया ।
फूल के समान, क्या हमें सजा पाओगे ?
अपने ग़मों को तुम, क्या भुला पाओगे ?

मिट्टी ही हमारा उदगम है,

इसी  में , जाने  दो  मिल ।
जीवन नहीं आसां 'अल्पी',

शायद यही थी, मेरी मंजिल |  
.........   ''अल्पना मिश्रा''

3 comments:

  1. बहुत जबरदस्त कविता से सामना हुआ है
    आपके सम्मान में एक श़ेर प्रस्तुत है
    फूल ही फूल खिल उठे वीराने में,वो क्या आए बहार आ गई मयखाने में,,,,,
    कोई आंचल कांटो से न उलझे यही शुभेच्छा,आदरणीया नमस्कार ।।।

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  2. दुख तो सभी की जिंदगी में होते हैं पर उन दुखों में खुशियां ढूंढना ही असली जिंदगी है। आपकी ये रचना सराहनी है।🙏..shraddha

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