चलो कहीं दूर हम,
एक आशियाना बनायेगें ,
जिसमें अपनी खोई उन,
यादों को सजायेंगे l
वह भी क्या दौर था जब,
रेत का बनाया हमने घरोंदा ,
पर ठान लिया था लहरों ने ,
हम इसे बहायेंगे l
वक्त का पता न चला,
कैसे वह गुजर गया ,
एक दूसरे से अपनी ,
हम करते रहे शिकायतें l उम्र के इस पड़ाव पर,
जिंदगी ठहर सी गई ,
आहिस्ते-आहिस्ते फिर हम,
मधुर गीत गुनगुनायेगें l
अब तो इस शहर से,
मन अपना है भर गया ,
चलो कहीं फ़ुरसत में,
हाले-दिल सुनायेंगें l
जानें कहाँ गुम हुई "अल्पी",
जहाँ की इस भींड़ में ,
बीते उन लम्हों को ,
दिल में फिर बसायेंगे l
चलो कहीं दूर हम,
एक आशियाना बनायेगें ,
जिसमे अपनी खोई उन,
यादों को सजायेंगे l l
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Bahut sundar kavita....
ReplyDeleteआशियां नशेमन घर आवास निवास बाड़ी झोंपड़ी ठिकाना सब इंसानो से बनते है और लिपट जातीं हैं अनगिनत खट्टी- मीठी यादें.धन्यवाद बहुत खूबसूरत कविता से परिचय हेतु,नमस्कार।
ReplyDeleteBahut khoobsurat Kavita. 🙏.....shraddha
ReplyDeleteBahut bahut dhanyabad bahnaa
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