Wednesday, November 27, 2013

"यादों का आशियाना"

चलो कहीं दूर हम,
एक आशियाना बनायेगें ,
जिसमें अपनी खोई उन,
यादों को सजायेंगे l 

वह भी क्या दौर था जब,
रेत का बनाया हमने घरोंदा ,
पर ठान लिया था लहरों ने ,
हम इसे बहायेंगे l 

वक्त का पता न चला,
कैसे वह गुजर गया ,
एक दूसरे से अपनी ,
हम करते रहे शिकायतें l 


उम्र के इस पड़ाव पर,
जिंदगी ठहर सी गई ,
आहिस्ते-आहिस्ते फिर हम,
मधुर गीत गुनगुनायेगें l


अब तो इस शहर से,
मन अपना है भर गया ,
चलो कहीं फ़ुरसत में,
हाले-दिल सुनायेंगें l

जानें कहाँ गुम हुई "अल्पी",
जहाँ की इस भींड़ में ,
बीते उन लम्हों को ,
दिल में फिर बसायेंगे l

चलो कहीं दूर हम,
एक आशियाना बनायेगें ,
जिसमे अपनी खोई उन,
यादों को सजायेंगे l l
..............''अल्पना मिश्रा ''










4 comments:

  1. Bahut sundar kavita....

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  2. आशियां नशेमन घर आवास निवास बाड़ी झोंपड़ी ठिकाना सब इंसानो से बनते है और लिपट जातीं हैं अनगिनत खट्टी- मीठी यादें.धन्यवाद बहुत खूबसूरत कविता से परिचय हेतु,नमस्कार।

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  3. Bahut khoobsurat Kavita. 🙏.....shraddha

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    1. Bahut bahut dhanyabad bahnaa

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